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Rehabilitation Center सब ठीक कर देगा, यह सोच है बेहद खतरनाक

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चंडीगढ़; 13 सितंबर (Punjab Media Team)। “मैं इसे सिर्फ एक बार आज़माऊँगा।” “मैं जब चाहूँ, इसे छोड़ सकता हूँ।” या यह सोच कि लंबे समय तक नशा करने के बाद भी “Rehabilitation Center में इलाज आसानी से हो जाएगा।” नशे के प्रयोग की ओर बढ़ रहे किसी युवा को ये बातें भले ही सामान्य लगें, लेकिन ऐसी धारणाएँ केवल चिंताजनक ही नहीं- बल्कि बेहद ख़तरनाक भी हो सकती हैं।

भगवंत मान सरकार ‘स्कूल नशेआँ विरुद्ध’ पाठ्यक्रम के माध्यम से युवाओं में नशे के सेवन को रोकने के लिए ऐसी धारणाओं को चुनौती देने और उन्हें दूर करने का प्रयास कर रही है। सीईजीए, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले और नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी व एस्थर डुफ्लो द्वारा सह-स्थापित शोध संस्था J-PAL के सहयोग से विकसित यह साक्ष्य-आधारित पाठ्यक्रम युवाओं के बीच नशीले पदार्थों, विशेष रूप से ओपिओइड्स की लत के जोखिम को कम करके आँकने की प्रवृत्ति पर ध्यान केंद्रित करता है।

ऐसी गलत धारणाएँ युवाओं में नशे के प्रयोग की संभावना बढ़ा सकती हैं और आगे चलकर लत का कारण बन सकती हैं। पाठ्यक्रम इस बात पर ज़ोर देता है कि नशे के ख़िलाफ़ लड़ाई नशे की लत लग जाने के बाद नहीं, बल्कि उससे बहुत पहले शुरू होनी चाहिए—ऐसे भ्रमों को दूर करके, जो नशे के सेवन को वास्तविकता से कम ख़तरनाक दिखाते हैं। पाठ्यक्रम में युवाओं के बीच नशे से संबंधित कई प्रमुख भ्रांतियों की पहचान की गई है, जिनका समाधान आवश्यक है।

Rehabilitation Center जाना इलाज की शुरुआत है, नशे से पूरी तरह मुक्ति की गारंटी नहीं

पहली और शायद सबसे ख़तरनाक भ्रांति यह है कि चिट्टा या हेरोइन को एक या कुछ बार आज़माने से लत नहीं लगती। वास्तविकता यह है कि हेरोइन अत्यधिक नशीला पदार्थ है और इसके एक बार सेवन से भी लत लगने का जोखिम हो सकता है। दूसरी भ्रांति यह है कि जिसने अभी-अभी नशे का सेवन शुरू किया है, वह जब चाहे इसे छोड़ सकता है। वास्तविकता यह है कि नशे की लत केवल इच्छाशक्ति का विषय नहीं है। एक बार निर्भरता विकसित हो जाने के बाद नशा छोड़ना बेहद कठिन हो सकता है।

तीसरी गलत धारणा यह है कि Rehabilitation Center में जाने का अर्थ है कि व्यक्ति पूरी तरह और स्थायी रूप से ठीक हो जाएगा। नशे से उबरना एक लंबी प्रक्रिया हो सकती है और दोबारा नशे की ओर लौटने की संभावना भी रहती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उपचार प्रभावी नहीं है, बल्कि यह कि ठीक होने के लिए निरंतर प्रयास और सहयोग आवश्यक है, इसे केवल एक बार की उपचार प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसलिए, रोकथाम को उपचार से बेहतर माना जाता है।

एक अन्य धारणा, जिस पर अभियान युवाओं को पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करता है, यह है कि तथाकथित ‘हल्के’ नशीले पदार्थ अपेक्षाकृत कम नुकसानदायक होते हैं और उनका नशे की लत से कोई संबंध नहीं होता। पाठ्यक्रम में तंबाकू, शराब, अफ़ीम, गोलियों और डॉक्टर द्वारा लिखी जाने वाली दवाओं को भी ऐसे पदार्थों के रूप में चिन्हित किया गया है, जो प्रयोग की शुरुआत का कारण बन सकते हैं, कई बार इनका सेवन करने वाले लोग इसके जोखिमों या इसे छोड़ने में आने वाली कठिनाइयों को पूरी तरह समझ नहीं पाते। Rehabilitation Center

नशे का नुकसान सिर्फ व्यक्ति तक सीमित नहीं, पूरे परिवार को प्रभावित करता है

पाँचवीं भ्रांति शायद उतनी स्पष्ट नहीं है: वह यह कि जो व्यक्ति अंततः नशे की लत का शिकार हो जाता है, उसने शुरुआत से ही नियमित रूप से नशा करने का इरादा बनाया होगा। अभियान इस बात पर ज़ोर देता है कि नशे की शुरुआत अस्थायी प्रयोग से भी हो सकती है। इसके पीछे साथियों का दबाव, व्यक्तिगत संकट, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ या प्रदर्शन का दबाव जैसे कई कारण हो सकते हैं।

छठी गलत धारणा यह है कि नशे का नुकसान मुख्य रूप से केवल नशा करने वाले व्यक्ति को ही होता है। स्कूल पाठ्यक्रम नशे की समस्या को व्यापक दृष्टिकोण से देखता है: नशे की लत के शारीरिक, चिकित्सकीय, आर्थिक और सामाजिक दुष्परिणाम हो सकते हैं तथा इसका असर व्यक्ति के रिश्तों और पूरे परिवार पर पड़ सकता है।

पंजाब के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने कहा, “मूल रूप से, ‘युद्ध नशेआँ विरुद्ध’ अभियान नशे के दुरुपयोग को लेकर होने वाली बातचीत का रुख बदलने का प्रयास कर रहा है—ऐसी बातचीत से, जो नशे की लत लग जाने के बाद शुरू होती है, ऐसी बातचीत की ओर, जो उस समय शुरू हो जब कोई युवा पहली बार यह सुनता है: ‘एक बार आज़माकर देखो, कुछ नहीं होगा।’ उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है: भ्रम को आदत बनने से पहले तोड़ना और प्रयोग को निर्भरता में बदलने से पहले रोकना।”

स्कूल पाठ्यक्रम ने विद्यार्थियों को नशे को समझने और ‘ना’ कहने का तरीका सिखाया

अमनदीप कौर, स्कूल ऑफ एमिनेंस, छेहरटा, अमृतसर में पाठ्यक्रम की नोडल शिक्षिका, ने कहा कि इस पाठ्यक्रम से विद्यार्थियों को दो महत्त्वपूर्ण तरीकों से लाभ हुआ है।

उन्होंने कहा, “पहला, इसने विद्यार्थियों को नशे की लत को समझने के लिए आवश्यक शब्दावली और विज्ञान आधारित जानकारी दी है। इससे वे यह समझ पा रहे हैं कि नशीले पदार्थ मस्तिष्क और शरीर पर किस प्रकार प्रभाव डालते हैं, बजाय इसके कि नशे की लत को केवल ‘इच्छाशक्ति’ या व्यक्तिगत पसंद का मामला समझा जाए।दूसरा, पाठ्यक्रम ने विद्यार्थियों को साथियों के दबाव या नशे की पेशकश का सामना करने पर ‘ना’ कहने की व्यावहारिक रणनीतियाँ उपलब्ध करवाई हैं। इससे वे वास्तविक जीवन में ऐसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए अधिक आत्मविश्वास महसूस कर रहे हैं।

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