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रवनीत बिट्टू की Satluj film मेकर्स को खुली चुनौती

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25 हजार लापता शवों के दस्तावेज दो, नहीं तो होगी कानूनी कार्रवाई

चंडीगढ़, 12 जुलाई (Punjab Media Team)।  दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म Satluj Film को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। केंद्रीय रेल एवं खाद्य प्रसंस्करण राज्यमंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने फिल्म के मेकर्स और निर्देशक को खुली चुनौती देते हुए कहा है कि यदि फिल्म में किए गए दावों के समर्थन में दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाए, अन्यथा कानूनी कार्रवाई का सामना करने के लिए तैयार रहें।

बिट्टू ने कहा कि Satluj film में दावा किया गया है कि पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान 25 हजार लोग लापता हुए या उनका अवैध रूप से दाह संस्कार किया गया। उन्होंने कहा कि फिल्म निर्माता इन दावों के समर्थन में सरकारी रिकॉर्ड, न्यायिक निष्कर्ष और अन्य प्रमाणित दस्तावेज जनता के सामने रखें।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यदि Satluj film निर्माता अपने दावों को प्रमाणित कर देते हैं तो वह सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के लिए तैयार हैं। लेकिन यदि ऐसा नहीं होता है तो झूठे तथ्यों को इतिहास के रूप में पेश करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर विवादित दावों को स्थापित तथ्य की तरह पेश नहीं किया जा सकता।

Satluj film को अपने अंतरराष्ट्रीय (ग्लोबल) कैटलॉग से भी हटा दिया है

इस बीच, फिल्म को लेकर विवाद और बढ़ गया है। ZEE5 ने फिल्म को अपने अंतरराष्ट्रीय (ग्लोबल) कैटलॉग से भी हटा दिया है। इससे पहले फिल्म भारत में भी प्लेटफॉर्म से हटाई जा चुकी थी। रिपोर्टों के मुताबिक, केंद्र सरकार द्वारा गठित समीक्षा समिति ने भी फिल्म पर लगे प्रतिबंध को जारी रखने की सिफारिश की है। समिति का मानना है कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत लगाया गया प्रतिबंध उचित था।

समिति के अनुसार, फिल्म की कहानी को लेकर यह आपत्ति जताई गई कि इसमें पंजाब में उग्रवाद के दौरान सुरक्षा बलों पर लगे आरोपों को प्रमुखता दी गई है, जबकि उग्रवादियों की हिंसक गतिविधियों को पर्याप्त रूप से नहीं दिखाया गया। इसी आधार पर प्रतिबंध जारी रखने की सिफारिश की गई है।

गौरतलब है कि ‘सतलुज’, जिसे पहले ‘पंजाब 95’ के नाम से बनाया गया था, मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। फिल्म में उनके उस अभियान को दिखाया गया है, जिसमें उन्होंने 1984 से 1994 के बीच कथित तौर पर अज्ञात शवों के अवैध दाह संस्कार के मामलों की जांच की थी।

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